कल कई तुमको अपना अपना कहता था,
जब मैं भी तुमको अपना अपना कहता था,
तब हमको छोड़ उसी के साथ बसी थीं तुम,
आज वही तुमको दूजा सा कहता है,
ये देख कभी मैं ऐसे गरल पिए जाता हूँ,
सम्पूर्ण जगत के कोलाहल को पिए चला जाता हूँ,
काश की तुमने हमको अपना समझा होता,
अपने नयनों की ज्योति को अपना संख होता,
ये दिवस न हम दोनों को ऐसे तड़पाता,
काश की तुमने हमको अपना समझ होता............
राजीव बाजपेयी
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